मसूरी स्थित भगवान शंकर आश्रम में माँ कामाख्या अनुष्ठान भव्य रूप से संपन्न हुआ। गुरुदेव आर्यम के सान्निध्य में आयोजित इस दिव्य कार्यक्रम में देश-विदेश से 600 से अधिक भक्त जुड़े।
Divine Maa Kamakhya Anushthan Conducted: देवभूमि उत्तराखंड के मसूरी की पावन वादियों में स्थित भगवान शंकर आश्रम एक बार फिर गहन आध्यात्मिक ऊर्जा, श्रद्धा और शक्ति साधना का केंद्र बना, जहाँ माँ कामाख्या को समर्पित एक विशिष्ट एवं दिव्य अनुष्ठान अत्यंत भव्यता के साथ सम्पन्न हुआ। आर्यम इंटरनेशनल फाउंडेशन के तत्वावधान में आयोजित इस विशेष आध्यात्मिक आयोजन ने देश ही नहीं बल्कि विदेशों में बसे श्रद्धालुओं को भी एक सूत्र में जोड़ दिया। उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र के शुभ संयोग में, अंबुबाची पर्व के आरंभ से पूर्व आयोजित इस विशेष अनुष्ठान में गूगल मीट के माध्यम से विश्वभर से 600 से अधिक श्रद्धालु जुड़े, जबकि 22 शिष्यों ने व्यक्तिगत रूप से आश्रम पहुंचकर अनुष्ठान में प्रत्यक्ष सहभागिता की। संपूर्ण आयोजन जगद्गुरु प्रोफेसर पुष्पेंद्र कुमार आर्यम जी महाराज के सान्निध्य एवं मार्गदर्शन में सम्पन्न हुआ।

आश्रम परिसर पूरे आयोजन के दौरान शक्ति, साधना और भक्ति के दिव्य वातावरण से अनुप्राणित रहा। मंत्रोच्चार, पुष्पार्चन और सामूहिक आराधना के बीच उपस्थित प्रत्येक साधक ने आध्यात्मिक ऊर्जा की गहन अनुभूति की। आयोजन का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं था, बल्कि श्रद्धालुओं को सनातन परंपरा की गूढ़ आध्यात्मिक चेतना से जोड़ना भी इसका प्रमुख केंद्र रहा। इस अवसर पर गुरुदेव आर्यम जी ने अपने उद्बोधन में अंबुबाची पर्व के गहन आध्यात्मिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक महत्व को विस्तारपूर्वक समझाया। उन्होंने कहा कि भारत की आत्मा उसकी सनातन परंपरा, शक्ति उपासना और प्रकृति के प्रति समर्पण में निहित है। भारतीय दर्शन में सृष्टि की संपूर्ण संरचना पुरुष और प्रकृति के संतुलन पर आधारित है, जहाँ प्रकृति स्वयं आदिशक्ति के रूप में सम्पूर्ण सृजन का मूल आधार है।

गुरुदेव ने कहा कि असम के नीलांचल पर्वत पर स्थित माँ कामाख्या शक्तिपीठ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि सनातन चेतना का एक जीवंत केंद्र है। यह शक्ति, तंत्र, साधना, ध्यान और दिव्य ऊर्जा का अद्वितीय संगम है। इक्यावन शक्तिपीठों में सर्वोच्च स्थान रखने वाला यह पीठ शक्ति साधकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने अंबुबाची पर्व के विषय में कहा कि यह वह विशेष कालखंड है जब माँ आदिशक्ति के रजस्वला होने की मान्यता है। सनातन परंपरा में यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि प्रकृति की सृजनशीलता, उर्वरता और ऊर्जा के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का दिव्य अवसर भी है। यह पर्व हमें सिखाता है कि सृजन, संरक्षण और ऊर्जा का प्रत्येक रूप देवी स्वरूप है।

विशेष अनुष्ठान के दौरान माँ कामाख्या सहस्त्रनामावली के साथ दिव्य पुष्पार्चन सम्पन्न कराया गया। पूजन में मुख्य रूप से रक्तवर्ण एवं श्वेत पुष्पों का उपयोग किया गया। रक्तवर्ण पुष्प शक्ति, संकल्प और ऊर्जा के प्रतीक रहे, जबकि श्वेत पुष्प शुद्धता, शांति और आध्यात्मिक संतुलन का प्रतिनिधित्व करते रहे। इस संतुलन ने संपूर्ण अनुष्ठान की आध्यात्मिक भावना को और अधिक प्रभावशाली बना दिया। आयोजन में शामिल सभी साधकों और श्रद्धालुओं के लिए रक्तवर्ण वस्त्र धारण करना निर्धारित किया गया था। लाल वस्त्रों में सुसज्जित श्रद्धालुओं की सामूहिक उपस्थिति ने पूरे आश्रम को शक्ति साधना के एक विराट केंद्र में परिवर्तित कर दिया। हर ओर श्रद्धा, अनुशासन और दिव्य ऊर्जा का अद्भुत समन्वय देखने को मिला।

अनुष्ठान के दौरान ऑनलाइन माध्यम से जुड़े भक्तों ने भी समान श्रद्धा और समर्पण के साथ सहभागिता निभाई। आधुनिक तकनीक और सनातन परंपरा का यह अद्भुत संगम आयोजन की एक विशेष उपलब्धि के रूप में सामने आया, जिसने भौगोलिक सीमाओं को समाप्त करते हुए विश्वभर के साधकों को एक आध्यात्मिक मंच पर जोड़ दिया। गुरुदेव आर्यम जी की सहज, सरल एवं गहन आध्यात्मिक व्याख्या ने उपस्थित श्रद्धालुओं को गहराई से प्रभावित किया। उनकी शिक्षाओं ने भक्तों के भीतर न केवल आस्था को सुदृढ़ किया, बल्कि मानसिक संतुलन, आत्मिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का भी संचार किया।
आयोजन के समापन पर श्रद्धालुओं ने इसे एक दिव्य, दुर्लभ और जीवन-परिवर्तनकारी आध्यात्मिक अनुभव बताया। भक्तों के अनुसार, यह अनुष्ठान केवल पूजा-अर्चना नहीं बल्कि आत्मिक जागरण, आंतरिक शुद्धि और शक्ति चेतना से जुड़ने का एक अद्भुत अवसर सिद्ध हुआ। आयोजकों ने बताया कि भगवान शंकर आश्रम भविष्य में भी ऐसे आध्यात्मिक आयोजनों के माध्यम से सनातन संस्कृति, शक्ति उपासना और वैदिक चेतना को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य निरंतर करता रहेगा।
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