ईरान पर हमले के बाद वैश्विक संकट गहराया, कच्चे तेल में 65% उछाल, धातुओं की कीमतों में भी तेजी

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Oil Prices Surge 65% After Iran Attack: अमेरिका-इजरायल के ईरान पर हमले के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से कच्चे तेल की कीमतों में 65% उछाल आया। जानिए कैसे इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और धातु बाजार पर पड़ा।

नई दिल्ली: अमेरिका और इजरायल द्वारा 28 फरवरी को ईरान पर किए गए संयुक्त हमले के बाद वैश्विक स्तर पर आर्थिक और भू-राजनीतिक संकट गहराता जा रहा है। इस हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत की खबर ने मध्य-पूर्व में तनाव को चरम पर पहुंचा दिया है। इसके परिणामस्वरूप ऊर्जा बाजार में भारी उथल-पुथल देखने को मिल रही है।

हमले के बाद ईरान ने कड़ा कदम उठाते हुए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद कर दिया, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल आपूर्ति मार्गों में से एक माना जाता है। इस जलडमरूमध्य के बंद होने से वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हुई, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में ऐतिहासिक उछाल दर्ज किया गया।

कमोडिटी बाजार के विशेषज्ञ और केडिया एडवायजरी के फाउंडर अजय केडिया के अनुसार, 28 फरवरी से लेकर 4 मई के बीच कच्चे तेल की कीमतों में 65.09 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। जहां 28 फरवरी को तेल की कीमत 6092 रुपये प्रति बैरल थी, वहीं यह बढ़कर 10,057 रुपये प्रति बैरल तक पहुंच गई।

केवल कच्चा तेल ही नहीं, बल्कि अन्य धातुओं के बाजार पर भी इस संकट का असर साफ दिखाई दे रहा है। एल्युमिनियम की कीमतों में 18.61 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, जो 312.80 रुपये प्रति किलोग्राम से बढ़कर 371 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई। वहीं, कॉपर और जिंक की कीमतों में भी क्रमशः 4.45 प्रतिशत और 4.81 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

इस बीच, ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए इजरायल के कई प्रमुख शहरों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। साथ ही, खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को भी निशाना बनाया गया, जिससे पूरे मध्य-पूर्व क्षेत्र में अस्थिरता और बढ़ गई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जल्द नहीं खुलता और तनाव इसी तरह जारी रहता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका गंभीर असर पड़ सकता है। ऊर्जा कीमतों में यह उछाल महंगाई को बढ़ावा देगा और कई देशों की आर्थिक स्थिति को प्रभावित कर सकता है।

फिलहाल दुनिया की निगाहें इस संकट के समाधान पर टिकी हैं, क्योंकि इसका प्रभाव केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी गहरा पड़ रहा है।

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