Who Will Be West Bengal CM: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी की ऐतिहासिक जीत के बाद मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर सस्पेंस बरकरार है। शुभेंदु अधिकारी, दिलीप घोष और स्वपन दासगुप्ता जैसे नाम चर्चा में हैं।
नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है, जहां भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए 207 सीटों पर कब्ज़ा कर लिया है। यह आंकड़ा दो-तिहाई बहुमत से भी अधिक है। वहीं, सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) 80 सीटों पर सिमट गई है। इस परिणाम ने राज्य की राजनीतिक दिशा को पूरी तरह बदल दिया है। हालांकि इस बड़ी जीत के बावजूद सबसे बड़ा सवाल अभी भी बना हुआ है—आखिर राज्य का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा? बीजेपी ने चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद के लिए किसी चेहरे की घोषणा नहीं की थी, और अब भी पार्टी ने इस पर अपने पत्ते नहीं खोले हैं।
‘नया चेहरा’ देने की परंपरा
बीजेपी पहले भी राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में बिना मुख्यमंत्री चेहरा घोषित किए चुनाव जीत चुकी है और बाद में नए चेहरों को आगे लाकर सबको चौंकाया है। इसी रणनीति को देखते हुए पश्चिम बंगाल में भी अंतिम निर्णय तक सस्पेंस बना रहने की संभावना है। चुनाव प्रचार के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने संकेत दिया था कि मुख्यमंत्री “बंगाल से ही” होगा, जिससे ‘बाहरी चेहरे’ के मुद्दे पर विपक्ष के आरोपों को जवाब दिया गया था।
शुभेंदु अधिकारी सबसे मजबूत दावेदार?
संभावित नामों में सबसे प्रमुख नाम Suvendu Adhikari का सामने आ रहा है। वे वर्तमान में राज्य की राजनीति में बीजेपी का सबसे बड़ा चेहरा माने जाते हैं और विधानसभा में विपक्ष के नेता भी रह चुके हैं। पूर्वी मेदिनीपुर क्षेत्र में उनकी मजबूत पकड़ और संगठनात्मक क्षमता उन्हें एक मजबूत दावेदार बनाती है। खास बात यह है कि उन्होंने चुनाव में Mamata Banerjee को भवानीपुर सीट से हराकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। हालांकि उनकी दावेदारी को लेकर कुछ सवाल भी उठ रहे हैं। उनका टीएमसी से जुड़ा अतीत और आरएसएस पृष्ठभूमि का अभाव पार्टी के कुछ वर्गों में असहजता पैदा कर सकता है।
स्वपन दासगुप्ता का नाम भी चर्चा में
एक अन्य नाम Swapan Dasgupta का भी लिया जा रहा है। वे पूर्व राज्यसभा सदस्य रह चुके हैं और एक वरिष्ठ पत्रकार तथा राजनीतिक विश्लेषक के रूप में जाने जाते हैं। उनकी बौद्धिक छवि, केंद्र के साथ मजबूत संबंध और बांग्ला भाषा व संस्कृति पर पकड़ उन्हें एक संभावित विकल्प बनाती है। हालांकि राज्य की जमीनी राजनीति में उनका प्रभाव अपेक्षाकृत सीमित माना जाता है।
दिलीप घोष की मजबूत संगठनात्मक पकड़
तीसरा प्रमुख नाम Dilip Ghosh का है, जो बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं। उनके नेतृत्व में पार्टी ने पश्चिम बंगाल में अपने संगठन को मजबूत किया और 2019 के लोकसभा चुनाव में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। दिलीप घोष का आरएसएस से जुड़ा बैकग्राउंड और ज़मीनी स्तर पर काम करने का अनुभव उन्हें एक मजबूत दावेदार बनाता है। खासकर ओबीसी और अनुसूचित जाति वर्गों में उनकी पकड़ को पार्टी के लिए फायदेमंद माना जाता है।
अंतिम फैसला नेतृत्व पर निर्भर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री के चयन में संगठनात्मक अनुभव, जनाधार और केंद्रीय नेतृत्व के साथ तालमेल जैसे कारक अहम भूमिका निभाएंगे। बीजेपी के पिछले फैसलों को देखते हुए यह भी संभव है कि पार्टी किसी नए और अपेक्षाकृत कम चर्चित चेहरे को सामने लाकर सभी को चौंका दे। फिलहाल पश्चिम बंगाल में सरकार गठन की प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही मुख्यमंत्री पद को लेकर अटकलों का दौर तेज हो गया है। आने वाले दिनों में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की बैठक के बाद इस सस्पेंस से पर्दा उठ सकता है।
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