वैश्विक तेल संकट और होर्मुज तनाव के बीच सरकार ने दावा किया है कि उसने 78 दिनों में ₹1.23 लाख करोड़ का राजस्व त्याग कर पेट्रोल-डीजल महंगाई का बोझ कम किया।
Petrol-Diesel Price Hike: वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी और पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच केंद्र सरकार ने दावा किया है कि उसने आम उपभोक्ताओं को पेट्रोल और डीजल की महंगाई से बचाने के लिए पिछले 78 दिनों में लगभग 1.23 लाख करोड़ रुपये के राजस्व का त्याग किया है। सरकार का कहना है कि यदि यह बोझ सीधे उपभोक्ताओं पर डाला जाता, तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों में और अधिक बढ़ोतरी देखने को मिल सकती थी। सरकारी सूत्रों के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य क्षेत्र में बढ़ते तनाव और खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उल्लेखनीय उछाल आया है। भारत अपनी तेल आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात करता है, ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृद्धि का सीधा असर देश की तेल कंपनियों की लागत पर पड़ता है।
एक्साइज ड्यूटी में कटौती से राहत
सरकार ने तेल कंपनियों पर बढ़ते वित्तीय दबाव और उपभोक्ताओं को राहत देने के उद्देश्य से पेट्रोल और डीजल पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी में कटौती का फैसला किया। इस कदम के कारण सरकार को राजस्व के रूप में बड़ी राशि छोड़नी पड़ी। सरकार का दावा है कि बीते 78 दिनों में इसी वजह से लगभग 1.23 लाख करोड़ रुपये का राजस्व नुकसान हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि करों में कटौती नहीं की जाती, तो वैश्विक तेल कीमतों में आई तेजी का पूरा असर घरेलू बाजार में दिखाई देता और ईंधन की कीमतें कहीं अधिक बढ़ सकती थीं।
अन्य देशों में बढ़ा ईंधन का दबाव
सरकारी पक्ष का कहना है कि दुनिया के कई देशों ने बढ़ती तेल कीमतों का बोझ सीधे उपभोक्ताओं पर डाला है। अमेरिका सहित कई देशों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार कई देशों में ईंधन की कीमतों में दोहरे अंकों की वृद्धि देखी गई, जिससे आम लोगों की जेब पर अतिरिक्त भार पड़ा।
तेल कंपनियों के घाटे में कमी
सूत्रों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण देश की तेल विपणन कंपनियों को प्रतिदिन भारी नुकसान उठाना पड़ रहा था। अनुमान है कि यह घाटा करीब 1,000 करोड़ रुपये प्रतिदिन तक पहुंच गया था। सरकार द्वारा पेट्रोल और डीजल की कीमतों में सीमित वृद्धि और कर संरचना में बदलाव के बाद तेल कंपनियों के घाटे में कमी आई है। आंकड़ों के मुताबिक कंपनियों का दैनिक घाटा घटकर लगभग 600 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। यानी कुल घाटे में लगभग 44 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।
अर्थव्यवस्था और उपभोक्ताओं के बीच संतुलन की चुनौती
ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती राजकोषीय संतुलन बनाए रखते हुए उपभोक्ताओं को राहत देना है। एक तरफ बढ़ती वैश्विक कीमतों का असर सरकारी आय और तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर पड़ता है, वहीं दूसरी तरफ महंगाई को नियंत्रित रखना भी जरूरी होता है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो सरकार और तेल कंपनियों दोनों के लिए दबाव बढ़ सकता है। हालांकि फिलहाल सरकार का दावा है कि उसने उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए राजस्व में बड़ी कटौती स्वीकार की है और तेल कीमतों के झटके को काफी हद तक खुद वहन किया है।
आगे क्या?
बाजार विश्लेषकों की नजर अब अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों, होर्मुज क्षेत्र की स्थिति और वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रम पर बनी हुई है। यदि हालात सामान्य होते हैं तो तेल कीमतों में नरमी आ सकती है, लेकिन तनाव बढ़ने की स्थिति में सरकार और तेल कंपनियों दोनों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
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