सहस्रों पुष्पों से हुआ दिव्य पुष्पार्चन, 600+ भक्तों की वैश्विक सहभागिता

0Shares

मसूरी (देहरादून) में काली जयंती और कृष्ण जन्माष्टमी पर भव्य काली-कृष्ण कृपा अनुष्ठान संपन्न। सहस्रों पुष्पों से पुष्पार्चन और Google Meet के माध्यम से देश-विदेश से 600+ भक्त जुड़े।

Kali-Krishna Kripa Anushthan in Mussoorie: देवभूमि उत्तराखंड की सुरम्य वादियों में स्थित मसूरी एक बार फिर आध्यात्मिक ऊर्जा से आलोकित हो उठी, जब ‘काली-कृष्ण कृपा अनुष्ठान’ का भव्य आयोजन भगवान शंकर आश्रय के तत्वावधान में संपन्न हुआ। काली जयंती और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन संयोग पर आयोजित इस विशेष अनुष्ठान का नेतृत्व परमप्रज्ञ जगद्गुरु प्रोफ़ेसर पुष्पेंद्र कुमार आर्यम जी महाराज ने किया। इस दिव्य आयोजन की सबसे उल्लेखनीय बात इसकी वैश्विक पहुँच रही। डिजिटल माध्यम Google Meet के जरिए भारत ही नहीं, बल्कि स्विट्ज़रलैंड, मॉरीशस, लंदन, कनाडा, अमेरिका, नेपाल और दुबई सहित कई देशों से 600 से अधिक श्रद्धालु एक ही समय पर इस अनुष्ठान से जुड़े। वहीं कुछ शिष्य प्रत्यक्ष रूप से आश्रम में उपस्थित होकर इस पूजा के साक्षी बने।

काली और कृष्ण: शक्ति व करुणा का अद्वितीय संगम

अनुष्ठान के दौरान आर्यम जी महाराज ने देवी काली और भगवान श्रीकृष्ण के आध्यात्मिक महत्व को विस्तार से समझाया। उनके अनुसार, देवी काली केवल संहार की प्रतीक नहीं, बल्कि जीवन की संचालिका हैं—जो अकाल मृत्यु से रक्षा करने वाली और सृष्टि में संतुलन स्थापित करने वाली परम शक्ति हैं। उन्होंने कहा कि काली की कृपा से असाध्य रोगों और संकटों से भी मुक्ति संभव है।

दूसरी ओर, भगवान श्रीकृष्ण को ‘पालनहार’ बताते हुए उन्होंने कहा कि वे प्रेम, करुणा और संरक्षण के प्रतीक हैं। सच्चे मन से उनकी आराधना करने वाले भक्तों के जीवन से भय, अभाव और संकट दूर हो जाते हैं, और सुख-समृद्धि का वास होता है। आर्यम जी महाराज ने इस अनुष्ठान का मूल संदेश स्पष्ट करते हुए कहा कि जब काली की शक्ति और कृष्ण की करुणा एक साथ भक्त पर बरसती है, तब जीवन में पूर्णता का अनुभव होता है—न भय रहता है, न ही किसी प्रकार की कमी।

सहस्रों पुष्पों से हुआ भव्य पुष्पार्चन

इस अनुष्ठान में सहस्रों पुष्पों से देवी-देवताओं का विशेष पूजन किया गया, जिसे ‘पुष्पार्चन’ के रूप में जाना जाता है। यह दृश्य अत्यंत मनमोहक और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण था। मंत्रोच्चार, ध्यान और भक्ति के वातावरण ने पूरे आश्रम को दिव्यता से भर दिया।

डिजिटल युग में आध्यात्मिक एकता

आयोजन ने यह सिद्ध कर दिया कि तकनीक के माध्यम से भक्ति की सीमाएं समाप्त हो सकती हैं। अलग-अलग देशों और समय-क्षेत्रों में रहने वाले श्रद्धालु एक ही संकल्प और भावना के साथ इस अनुष्ठान में शामिल हुए। इससे वैश्विक स्तर पर सनातन परंपरा की एकता और विस्तार का संदेश भी मिला।

भक्त स्वयं बनें अपने पुरोहित” — नई आध्यात्मिक दिशा

ट्रस्ट की अधिशासी प्रवक्ता माँ यामिनी श्री ने बताया कि आर्यम जी महाराज सनातन और वैदिक परंपराओं के उन गूढ़ रहस्यों को उजागर कर रहे हैं, जो वर्षों से आम जनमानस से दूर रहे। गुरुदेव का प्रमुख संदेश है कि हर व्यक्ति स्वयं अपने आध्यात्मिक मार्ग का निर्माता बने। “भक्त स्वयं अपने पुरोहित बनें और परमात्मा से सीधा संबंध स्थापित करें”—इस विचारधारा से हजारों लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आ रहा है।

Loading

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *