ड्राइवर, नौकर या रिश्तेदार के नाम पर खरीदी संपत्ति अब नहीं बच पाएगी, काले धन पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती

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सुप्रीम कोर्ट ने बेनामी संपत्तियों पर बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि 2016 से पहले किए गए बेनामी लेनदेन की संपत्तियां भी जब्त की जा सकती हैं। ड्राइवर, नौकर या रिश्तेदार के नाम खरीदी संपत्तियां अब जांच के दायरे में आएंगी।

Benami Property Supreme Court Verdict: देश में बेनामी संपत्तियों के जरिए काला धन छिपाने वालों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा और सख्त संदेश दिया है। अदालत ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि सरकार और आयकर विभाग को वर्ष 2016 से पहले किए गए बेनामी लेनदेन की जांच और संपत्तियों की जब्ती का अधिकार है। इस फैसले के बाद उन लोगों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं जिन्होंने अपनी संपत्ति ड्राइवर, नौकर, कुक, रिश्तेदार या किसी आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति के नाम पर खरीद रखी है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बेनामी लेनदेन (निषेध) अधिनियम, 1988 में वर्ष 2016 में किए गए संशोधन के तहत जांच, कार्रवाई और संपत्ति जब्ती से जुड़े प्रावधान पुराने मामलों पर भी लागू किए जा सकते हैं। हालांकि अदालत ने यह भी साफ किया कि नवंबर 2016 से पहले हुए मामलों में संशोधित कानून के तहत कठोर दंड नहीं दिया जाएगा।

क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला?

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यदि कोई संपत्ति वास्तविक मालिक ने किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर खरीदी है और उसका उद्देश्य कानून से बचना या काला धन छिपाना था, तो ऐसी संपत्ति सरकार जब्त कर सकती है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल दस्तावेजों में नाम होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि जांच एजेंसियां यह देखेंगी कि संपत्ति का वास्तविक मालिक कौन है और खरीद के पीछे का उद्देश्य क्या था।

2016 से पहले के सौदे भी जांच के दायरे में

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि 2016 के संशोधन में जो प्रक्रियात्मक बदलाव किए गए थे, वे पिछली तारीख से लागू हो सकते हैं। इसका मतलब है कि नवंबर 2016 से पहले किए गए बेनामी सौदों की भी जांच होगी और संबंधित संपत्तियों को जब्त किया जा सकेगा।

विशेषज्ञों के अनुसार इस फैसले से आयकर विभाग और अन्य एजेंसियों को पुराने मामलों को दोबारा खोलने की ताकत मिल गई है। कई दशकों पुराने जमीन और संपत्ति के लेनदेन अब जांच के दायरे में आ सकते हैं।

सजा को लेकर क्या कहा अदालत ने?

सुप्रीम Court ने यह भी स्पष्ट किया कि पुराने मामलों में संशोधित कानून के तहत 7 साल की सजा नहीं दी जा सकती। नवंबर 2016 से पहले हुए मामलों में केवल पुराने कानून के प्रावधान लागू होंगे, जिनमें अधिकतम 3 साल तक की सजा का प्रावधान था। साथ ही ऐसे मामलों में संशोधित कानून के तहत जुर्माना भी लागू नहीं होगा।

वसीयत और उत्तराधिकार के जरिए बचने की कोशिश पर भी रोक

अक्सर लोग बेनामी संपत्ति को वैध दिखाने के लिए वसीयत या उत्तराधिकार का सहारा लेते थे। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर भी सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने कहा कि यदि कोई संपत्ति मूल रूप से बेनामी है, तो उसे वसीयत के जरिए वास्तविक मालिक तक पहुंचाना भी अवैध माना जाएगा।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायालय केवल कागजी दस्तावेजों पर भरोसा नहीं करेगा, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि सौदे की असली प्रकृति क्या थी।

बेनामी कानून के तहत क्या हैं प्रावधान?

बेनामी संपत्ति कानून के तहत सरकार के पास कई सख्त अधिकार हैं। इनमें शामिल हैं:

  • बेनामी संपत्ति की जब्ती
  • संपत्ति के बाजार मूल्य का 25 प्रतिशत तक जुर्माना
  • 2016 के बाद के मामलों में 7 साल तक की जेल

क्यों महत्वपूर्ण माना जा रहा है फैसला?

कर विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला काले धन और फर्जी संपत्ति लेनदेन पर बड़ी कार्रवाई का रास्ता खोल सकता है। अब जांच एजेंसियां केवल नाम और दस्तावेज नहीं देखेंगी, बल्कि यह भी जांचेंगी कि संपत्ति खरीदने के लिए पैसा किसने दिया और उसका वास्तविक उपयोग कौन कर रहा था।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला उन लोगों के लिए चेतावनी है जिन्होंने टैक्स बचाने या संपत्ति छिपाने के लिए दूसरों के नाम का इस्तेमाल किया था।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला “मंजुला और अन्य बनाम डी. ए. श्रीनिवास” से जुड़ा था। मामले में कुछ लोगों ने वसीयत के आधार पर संपत्तियों पर मालिकाना हक का दावा किया था। जांच के दौरान सामने आया कि ये संपत्तियां भूमि सुधार कानूनों से बचने के उद्देश्य से दूसरे लोगों के नाम पर खरीदी गई थीं।

सुप्रीम कोर्ट ने दावों को खारिज करते हुए सरकार को आठ सप्ताह के भीतर संबंधित संपत्तियों को अपने कब्जे में लेने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि कानून का दुरुपयोग कर बनाई गई बेनामी व्यवस्था को संरक्षण नहीं दिया जा सकता।

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